वैश्विक ऊर्जा संकट: एशियाई महाशक्तियों की रणनीतियां और लचीलापन

Tokyo cityscape with highways, Shinkansen and local trains
A busy Tokyo urban scene featuring highways, trains, and cityscape

ईरान में युद्ध शुरू होने के बाद एशिया के लिए एक बड़ा ऊर्जा संकट पैदा हो गया था, क्योंकि इस क्षेत्र को अपना 80% से अधिक तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से मिलता है। हालाँकि, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे अमीर और शक्तिशाली देशों ने कूटनीति, गहरे रणनीतिक भंडार और ऊर्जा संरक्षण के माध्यम से इस झटके का कम से कम अल्पावधि में सफलतापूर्वक सामना किया है।

दक्षिण कोरिया के आक्रामक कदम और कूटनीति दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे मायुंग ने शुरुआत में इस संकट को लेकर चिंता जताई थी और इसे “लोगों की आजीविका के लिए युद्ध” कहा था। सरकार ने तुरंत ऊर्जा संरक्षण के उपाय किए; नागरिकों से कम समय तक स्नान करने को कहा गया, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए हर दूसरे दिन ड्राइविंग सीमित कर दी गई और दशकों में पहली बार ईंधन की कीमतों पर सीमा (प्राइस कैप) तय की गई। इसके अलावा, सरकार ने कई परमाणु रिएक्टरों को चालू करने की समय सीमा को आगे बढ़ाया और 17 बिलियन डॉलर के आपातकालीन राहत पैकेज को मंजूरी दी, जिसमें कम आय वाले नागरिकों के लिए 400 डॉलर तक की नकद सब्सिडी शामिल है।

कूटनीतिक स्तर पर, दक्षिण कोरियाई दूत ने यूएई (UAE), ओमान, सऊदी अरब, कतर और कजाकिस्तान की यात्राएं कीं, जिसके परिणामस्वरूप भारी मात्रा में कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल उद्योग के लिए महत्वपूर्ण फीडस्टॉक ‘नेफ्था’ (naphtha) की आपूर्ति सुनिश्चित हुई। इसके बदले में, सियोल ने इन देशों के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहर कच्चे तेल के भंडारण की सुविधा और वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग स्थापित करने में मदद करने की पेशकश की है। इन उपायों के कारण, दक्षिण कोरिया अब जुलाई या अगस्त तक बिना किसी भारी आर्थिक नुकसान के इस संकट का सामना करने के लिए तैयार दिख रहा है।

Shanghai cityscape with high-rise buildings, two bridges, and curving highways over a river in golden hour light
A vibrant view of Shanghai’s skyline featuring iconic skyscrapers and busy bridges over the river

चीन की दूरदर्शिता और भारत का दृष्टिकोण मध्य पूर्व आपूर्ति संकट का सबसे ज्यादा असर बिजली के लिए आवश्यक एलएनजी (LNG), परिवहन के लिए कच्चे तेल और प्लास्टिक जैसे उत्पादों के लिए जरूरी पेट्रोकेमिकल्स पर पड़ता है। लेकिन चीन ने वर्षों से ऐसी स्थिति के लिए खुद को तैयार किया था। उसने इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के व्यापक उपयोग को सब्सिडी दी, घरेलू कच्चे तेल के उत्पादन को बढ़ाया और रूस के साथ ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए साझेदारी की। वर्तमान में, चीन की ऊर्जा खपत में आधे से अधिक हिस्सा कोयले का है, जबकि तेल का हिस्सा 20% से भी कम है। राजनीतिक मोर्चे पर, चीनी नेता शी जिनपिंग ने सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के साथ बातचीत में खाड़ी के माध्यम से सुरक्षित पारगमन को बहाल करने के लिए “तत्काल और व्यापक” युद्धविराम का आह्वान किया।

दूसरी ओर, भारत ने भी हाल के हफ्तों में रूस से अपना आयात काफी बढ़ाकर अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित और मजबूत किया है।

जापान की वित्तीय ताकत और विशाल भंडार जापान के पास 254 दिनों का विशाल तेल भंडार है, जो औद्योगिक देशों में सबसे बड़ा है, और उसे फिलहाल इसमें से केवल 40 दिनों के भंडार का ही उपयोग करने की आवश्यकता है। राजनीतिक प्रभाव के डर से जापानी अधिकारियों ने नागरिकों से ऊर्जा कटौती की मांग नहीं की। इसके बजाय, टोक्यो ने अपनी वित्तीय ताकत का इस्तेमाल करते हुए दक्षिण पूर्व एशिया के अपने पड़ोसी देशों को लगभग 10 बिलियन डॉलर के आपातकालीन ऋण की पेशकश की। इसके साथ ही, जापान ने चिकित्सा संस्थानों को कमी से बचाने के लिए अपने राज्य के भंडार से 50 मिलियन प्लास्टिक दस्ताने जारी करने का भी संकल्प लिया।

निष्कर्ष यद्यपि कम आय वाले देश अभी भी इस संकट से जूझ रहे हैं, अमीर और शक्तिशाली एशियाई देशों ने मध्य पूर्व के बाहर (जैसे अमेरिका और रूस) वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को खोज कर अपनी अर्थव्यवस्थाओं को ढालने में सफलता पाई है। हालांकि, यह सफलता क्षणिक हो सकती है; यदि यह संकट लंबा खिंचता है, तो अंततः एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को भी गंभीर नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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